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जन्मस्थान... शामली जिला शामली उत्तर प्रदेश, कर्मस्थान..... वर्तमान में लखनऊ

गुरुवार, दिसंबर 15, 2011

कलर सिंह

कलर सिंह ! क्या आपने ये नाम कभी सुना है? शायद नहीं सुना होगा. दरअसल एक सप्ताह पहले मैंने भी नहीं सुना था. पिछले सप्ताह रुड़की (उत्तराखंड) में कलर सिंह नाम के एक सज्जन से मेरी मुलाकात हुई. वो राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान में काम करते हैं. मैंने उनसे इस अनोखे नाम रखने के बारे में पूछा तो पहले तो आश्चर्य हुआ कि आज तक उनके सहकर्मियों ने उनसे ये बात नहीं पूछी थी, खैर कलर सिंह ने बताया कि जब वो तीन साल के थे गंभीर रूप से बीमार पड़ गए थे और मरणासन्न हो गए थे. तब एक डाक्टर ने उनका इलाज करके उनकी जान बचाई थी. उन डाक्टर का नाम था डा. कालरा जिनके नाम पर घरवालों ने उनका नाम कलर सिंह रख दिया.
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यही हैं जनाब कलर सिंह
(विवरण एवं चित्र कलर सिंह की सहमति से ब्लाग पर प्रकाशित किया गया है)

शुक्रवार, नवंबर 11, 2011

11-11-11


बात 12 फरवरी 2000 की है मैं उस समय मेरठ विश्वविद्यालय परिसर से M.Sc. कर रहा था मेरे बैच में 9 छात्र और 2 छात्राएं थे. उस दिन हम सब अपने ही एक साथी का जन्मदिन मनाने के लिए विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार के सामने चाचा रेस्टोरेंट में एकत्र हुए थे. सभी लोग बातचीत कर रहे थे कि एक मित्र अशोक ने कहा कि उसने अपने एक पुराने मित्र के साथ वादा कर रखा है कि चाहे कहीं भी रहे पर 11-11-11 को वो उस मित्र से प्रतापगढ़ रेलवे स्टेशन पर मिलेगा. उसकी बात सुन कर मैंने कहा कि हम सब बैचमेट भी ऐसे ही मिलने का तय कर लेते हैं. इस पर खूब चर्चा हुई, 2000 लीप वर्ष था तय हुआ हर 29 फरवरी को मिला जायेगा.
दुर्भाग्यवश उस दिन जिस मित्र का जन्मदिन मना रहे थे वो एक महीने बाद ही एक सड़क दुर्घटना में नहीं रहा.
वक्त बीता चार साल बाद 2004 में 29 फरवरी को 10 में से 9 बैचमेट मेरठ विश्वविद्यालय परिसर में एकत्र हुए, पूरानी यादें ताजा की.
फिर चार साल बाद 2008 में सब लोग और ज्यादा व्यस्त हो गए फिर भी 6 लोग इक्कठे हुए, हाँ इस बार जगह बदल गयी थी सब दिल्ली में मिले. तय हुआ कि 2012 में सब परिवार सहित इक्कठे होंगे.
आज 11-11-11 को ये सब याद आ गया क्यों कि इसी तारीख से बात शुरू हुई थी. आज अशोक से बात नहीं हो पाई पता नहीं वो आज उस मित्र से प्रतापगढ़ रेलवे स्टेशन पर मिला कि नहीं, बात होंगी तो आपसे जरूर बताऊंगा.


मैंने जो लिखा उसके बारे में मित्र अशोक के विचार जानने के लिए यहाँ चटका (Click) लगाएं


बुधवार, अक्टूबर 26, 2011

दीपावली

पिछली दो दीपावली माता पिता से दूर रहकर मनानी पड़ी थी . दरअसल पर्यावरण की देख रेख करने वालों का काम दीपावली को और बढ़ जाता है क्योंकि पटाखों से पर्यावरण प्रदूषण का स्तर बढ़ जाता है . इसीलिए छुट्टी नहीं मिलती थी. पर इस बार छुट्टी मिल गई और दीपावली घर पर मना रहा हूँ .
जिनके कारण छुट्टी मिल गई उन सभी लोगों का धन्यवाद,
त्यौहार का प्रकाश हर इंसान के मन को प्रकाशित करता रहे यही कामना है.  

शुक्रवार, सितंबर 16, 2011

लोग


आज कार्यालय में हिन्दी सप्ताह समापन समारोह के अन्तर्गत स्वरचित हिन्दी कविता पाठ प्रतियोगिता काआयोजन किया गया था। आयोजन में अतिथि थे श्री राकेश जेटली (हिंदी अधिकारी एन टी पी सी) तथा श्री विजय नारायण तिवारी (वरिष्ठ हिंदी अधिकारी नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति).

निर्णायक थे श्री रामेश्वर प्रसाद द्विवेदी ’प्रलयंकर’ एवं श्री वाहिद अली 'वाहिद' और मेरी इस कविता को प्रथम पुरस्कार के लिये चुना गया

कविता प्रस्तुत है

बन गई दुनिया तमाशा और देखते हैं लोग

दूसरों का घर जला कर रोटी सेकतें हैं लोग

एक रोटी के लिए दिन भर कमाए कोई माँ
और दस दस रोटियां नाली में फेंकते हैं लोग

हर तरफ है भीड़ कितनी फिर भी तन्हाई में लोग
जी रहे हैं झूठ के सागर की गहराई में लोग
और जिन हवाओं से कभी खुशबु यहाँ थी फैलती
आंधियां ही पा रहे हैं ऐसी पुरवाई में लोग

चल रही है तेज दुनिया फिर भी क्यूँ ठहरे हैं लोग
मरता सच कितना भी चीखे सब तरफ बहरे हैं लोग
और सांप भी तो फन छुपाये देख कर जिनको यहाँ
आज के इस दौर में तो इस कदर जहरे हैं लोग

पास हैं हथियार कितने फिर भी घबराते हैं लोग
दोस्तों को दे के धोखा हँसते ही जाते हैं लोग
और हैं नहीं देखो सुरक्षित अब किसी की थालियाँ
छेद करते हैं उसी में जिसमें खुद खाते हैं लोग

हो गई दुनिया ये कैसी और हैं कैसे ये लोग
मैं भला कैसे ये समझूं किसके हैं जैसे ये लोग
और जिनके हाथों से चमन हर बार उजड़ा है यहाँ
बनके बैठे हैं वो माली सच में हैं ऐसे ये लोग